Tuesday, 15 September 2020

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸                 --------------------------------                  🙏 *जय श्रीकृष्ण*  🙏                 --------------------------------                          ---*⚜*---         *!! नैव श्राद्ध विवर्जयेत्!!* "श्राद्ध छोडे नहीं"                           ---*⚜*--- *संप्राप्ते श्राद्धकालेपि पंचक्रोशांतरेस्थितम्।* *जामातरं परित्यज्य तथा च दुहितुः सुतम्।।*         पद्मपुराणम, भूमिखण्ड ०६७/८जो श्राद्धकाल आने पर भी काम, क्रोध अथवा भय से, पितर पांच कोस के भीतर रहनेवाले दामाद, भानजे तथा बहन को नहीं बुलाता और सदा दूसरों को ही भोजन कराता है, उसके श्राद्ध में पितर और देवता अन्न ग्रहण नहीं करते ।‘                      ---*⚜*--- *काले न्यायागतम्पात्रे विधिना प्रतिपादितम्।* *प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र     यत्रावतिष्ठति।।*                      मत्स्यपुराण १४१/ ७५यदि श्राद्धोपयुक्त काल में न्याय उपार्जित अन्न (मृतकों के निमित्त) विधिपूर्वक सत्पात्र को दान दिया जाता है तो वह अन्न  मृतक जहां कहीं भी रहते हैं, उन्हें प्राप्त होता है । जैसे बछड़ा गौओं में विलीन हुई अपनी माता को ढूंढ निकालता है, उसी प्रकार श्राद्ध में प्रयुक्त हुआ मंत्र (दान की वस्तुओं को ) उस जीव के पास पहुंचा देता है। इसप्रकार श्रद्धासहित विधिपूर्वक किया गया श्राद्ध-दान उस जीव को प्राप्त हो जाता है जिसके लिये वह किया जाता है।                      ---*⚜*---*एवं विधानत: श्राद्ध: कुर्यात्  स्वविभवोचितम्।**आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त जगत् प्रीणाति मानव:।।*                                  ब्रह्मपुराण२२०/२०४"श्राद्ध से केवल अपनी तथा पितरों की ही संतृप्ति नहीं होती, जो व्यक्ति अपने धन के अनुरूप श्रद्धा एवं विधिपूर्वक श्राद्ध करता हैं वह ब्रह्मा से ले कर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत को संतुष्ट कर देता हैं।"                    🙏 *जय मातादी* 🙏               

*पित्र ऋण से उऋण होनेके लिए तर्पण और श्राद्ध कब ?* 🕉️जीवन मे जो भी उन्नति या अवनति होती है उसमे कहीं न कहीं पितरों के आशीर्वाद और श्राप का प्रभाव होता है।☸ गया मे पिंडदान पितरों की संतुष्टि के लिए पितृ पक्ष के अलावा वर्ष मे अन्य दिनों मे भी श्राद्ध किया जा सकता है।इस बारे मे महाभारत और नारद पुराण मे बताए गये दिनों की गिनती करें तो कुछ 96 दिन ऐसे होते हैं जिनमें श्राद्ध किया जा सकता है।📿 इस प्रकार हर महीने 4 या 5 मौके आते ही हैं जिनमें पितरों की संतुष्टि के लिए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन करवाया जा सकता है।*अमावस्या,**सूर्य संक्रांति,* *वैधृति और**व्यतिपात योग हैं।*इनके साथ ही अन्य पर्व और विशेष तिथियों पर पितृ कर्म किये जा सकते हैं।🔱कूर्म पुराण मे कहा गया है कि श्राद्ध करने के लिए आवश्यक वस्तुयें, ब्राह्मण और संपत्ति के मिल जाने पर समय और दिन से जुड़े नियमों पर बिना विचार किए किसी भी दिन श्राद्ध किया जा सकता है।🌞वराह पुराण मे भी यही कहा गया है कि सामग्री और पवित्र जगह मिल जाने पर श्राद्ध करने से उसका पूरा फल मिलता है।🍁इसी प्रकार महा भारत के अश्वमेधिक पर्व मे श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि जिस समय भी ब्राह्मण,गाय का दूध,दही,घी,कुशा,जौ, अक्षत,काले तिल,तुलसी,फूल,गंगा जल और अच्छा स्थान मिल जाए। उसी समय श्राद्ध कर देना चाहिये।🔥वर्ष की 12 अमावस्या -हर महीने की अमावस्या पर श्राद्ध कर सकते हैं।☸4 युगादि तिथियां - तिथि,🍁वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि।🍁भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को श्राद्ध करने से पितृ संतुष्ट हो जाते हैं।🍁कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नौंवी तिथि।। 🍁माघ माह की अमावस्या।☸14 मन्वादि तिथियां- इनमे चैत्र,ज्येष्ठ,आषाढ़, कार्तिक,और फाल्गुन महीने की पूर्णिमा है।🍁चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि,🍁आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि,🍁श्रावण मास की अमावस्या पर भी श्राद्ध किया जा सकता है।। 🍁भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि,🍁भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि पर श्राद्ध कर सकते हैं।। 🍁अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नौवीं तिथि,🍁कार्तिक माह के शुक्लपक्ष की बारहवीं तिथि,🍁पौष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि,🍁माघ मास के शुक्ल पक्ष की सातवीं तिथि।☸12* संक्रांति -हर महीने की 13 से 17 तारीख के बीच मे सूर्य राशि बदलता है।उसे संक्रांति कहते हैं।🕉️12* वैधृति योग- ग्रहों की स्थिति से हर महीने वैधृति योग बनता है।इस दिन श्राद्ध कर सकते हैं।☸12* व्यतिपात योग -विशेष नक्षत्र और वार से मिलकर ये योग बनता है।इस दिन भी पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है।☸15 महालय -श्राद्ध पक्ष हर वर्ष आश्विन महीने में कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या पितृ पक्ष मे श्राद्ध किए जाते हैं।!! ॐपितृभ्यो नमः !!

Sunday, 6 September 2020

कई क्षेत्रोंमें देखा/सुना जाता है कि प्रायः लोग सौभाग्यवती स्त्रीके श्राद्धमें सौभाग्यवती स्त्रीको,विधवा स्त्रीके श्राद्धमें विधवा स्त्री को,तथा बालकोंके श्राद्धमें बालकोंको निमंत्रित करते हैं परंतु यह परंपरा अशास्त्रीय है/ गलत है ऐसा नहीं करना चाहिए।*माता-पिता, सधवा, विधवा, बालकादिके सभी प्रकारके श्राद्धोंमें वेदज्ञ, श्रेष्ठ, सदाचारी, सत्कुलोत्पन्न, श्रोत्रिय, सन्ध्या गायत्रीसे युक्त, पुरुष ब्राह्मणोंको ही निमंत्रित करनेका शास्त्रोंमें विधान है।*शास्त्रोंमें कहीं भी स्त्रियोंके लिए श्राद्धमें निमंत्रण करनेका विधान नहीं है इसलिए माता बहनोंका श्राद्धमें जाना, उन्हें निमंत्रित करना दोनों ही अपराध हैं।हां शास्त्रोंमें इतना जरूर कहा गया है कि सौभाग्यवती स्त्रीके श्राद्धमें अथवा सती ( पतिके साथ जलने वाली स्त्री) के श्राद्धमें ब्राह्मणोंके साथमें ब्राह्मणीका भी (जोड़े से) निमंत्रण करे—*#भर्तुरग्रे_मृता_नारी_सहदाहेन_वा_मृता।**#तस्याः_स्थाने_नियुञ्जीत_विप्रैः_सह_सुवासिनीम्।।* (मार्कण्डेय)*#श्राद्धमें_विहित_उत्तम_ब्राह्मण—**श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः।**अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम्।।* (#मनुस्मृति- 3/128)*#अर्थ—* देवताओंसे संबंधित अन्नको और पितरों से संबंधित अन्नको श्रोत्रिय (वेदपाठी) कुलाचारसे भी योग्यतम ब्राह्मण को ही देना चाहिए, इस प्रकारके श्रेष्ठ ब्राह्मणको दिया गया हव्य तथा कव्य महाफलको देने वाला होता है।*सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते।**एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मः।।* (#मनुस्मृति–3/ 131)*#अर्थ—* जहां वेदोंको न जानने वाले 1000000 ब्राह्मण भोजन करें ,वहां वेद मन्त्रज्ञ एक ही ब्राह्मण धर्मफल देनेमें उन सबके तुल्य होता है इसलिए उन सबके स्थानमें एक ही वेदज्ञ योग्य होता है।*#अश्रोत्रिय_ब्राह्मणोंको_श्राद्धादिमें_भोजन_नहीं_कराना_चाहिए—**यावतो ग्रसते ग्रासान् हव्यकव्येष्वमंत्रवित्।**तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूलरष्ट्ययोगुडान्।।**#अर्थ—* वेदमंत्र न जाने वाला ब्राह्मण देवकार्यमें और पितृकार्यमें जितने ग्रास खाता है , तो उसको खिलाने वा ला मनुष्य उतने ही जलते हुए शूल और लोहे के पिण्डों को मरने कर नरकमें जाकर खाता है।*#सुयोग्य_श्रोत्रिय_आदि_ब्राह्मणोंके_न_मिलने_पर_श्राद्धके_लिए_मध्यम_ब्राह्मण—*मातामहादि संबंधियोंको ही श्राद्धमें निमंत्रित करना चाहिए—#एतान्_मातामहादीन्_दश_मुख्यश्रोत्रियाऽऽद्यसम्भवे_भोजयेत्। (#मन्वर्थमुक्तावल्याम्)*मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।**दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्।।* (#मनुस्मृति- 3/148)*#अर्थ—* नाना, मामा, भांजे, ससुर, गुरु, दौहित्र (पुत्रीका पुत्र), दामाद, बंधु , ऋत्विक और अपने यजमानको भी देवकार्य एवं पितृ कार्यमें भोजनीय ब्राह्मणके रूपमें भोजन करावे।श्राद्धमें भोजनके लिए यदि #भानजा मिले तो दस ब्राह्मणोंसे श्रेष्ठ है ।#दौहित्र सौ ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है।#जीजा हजार ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताया गया है। और #जमाई सबसे श्रेष्ठ बताया गया है—*भागिनेयो दशविप्रेण* *दौहित्र शतमुच्यते।**भगिनीभर्ता सहस्रेषु* *अनन्तं दुहितापति:।।* (#व्याघ्रपाद_स्मृतिः)उपर्युक्त संबंधियोंका श्राद्धादिमें भोजन कराना केवल ब्राह्मणोंके लिए ही विहित हैं।क्षत्रिय आदि तो केवल ब्राह्मणोंका ही निमंत्रण करें, क्योंकि उनके संबंधी तो ब्राह्मण है नहीं इस दृष्टि से।*#श्राद्धमें_वर्ज्य_ब्राह्मण* *#धर्मसिंधुके_आधार_पर—*क्षय आदि महारोगोंसे युक्तविकलांग, काणा, बहरा, गूंगा, दुश्मन, जुआरीद्रव्य लेकर पढ़ाने वालामित्रद्रोही, निंदक, कुत्सित नखों वाला काले दांतों वाला, हिजड़ा माता, पिता, गुरुको त्यागने वाला चोर, नास्तिक,पाप कर्म करने वाला स्नान संध्यादि कर्मोंको त्यागने वाला नक्षत्रविद्यासे उपजीविका चलाने वाला वैद्य, राजाका नौकर, गायक, लिखने वाला (पैसा लेकर जो टाइपिंग करते हैं )ब्याज लेने वाला वेद बेचने वाला कविता करके उपजीविका करने वाला पुजारी, कला प्रदर्शन करने वाला समुद्र यात्रा करने वाला शस्त्र बनाने वाला पक्षियोंको पालने वाला परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करने वाला)शिल्प कर्म करनेवाला शूद्र से होम करानेवाला जटा वाला, दया से रहित रजस्वला स्त्रीका पति गर्भिणी स्त्री का पति कूबड़ा, वोंना, व्यापारी जिसकी स्त्री मर गई हो शूद्रका गुरु शूद्रका शिष्य पाखंडी, गायोंको बेचने वाला रस बेचने वाला वेदकी निंदा करनेवाला कृपण, पतितमेंढा़ और भैंसा पालनेवाला वेदको भूलनेवालाऐसे ब्राह्मणोंको देवकर्ममें और पितृकर्ममें वर्जित करना चाहिए।*#विद्याशीलादिगुणत्वे_कुष्ठित्वकाणत्वादिशारीरदोषाणां_न_दूषकत्वम्।* (#धर्मसिंधौ)*#अर्थ—* विद्या, शीलादि गुणोंसे युक्त ब्राह्मण कुष्ठी और काणादि होने पर भी त्याज्य नहीं है।श्राद्ध आदिमें यथोक्त गुण संपन्न ब्राह्मण न मिलने पर उपर्युक्त अवगुणों वाला तो नहीं ही लेना चाहिए ।यथोचित गुणोंसे रहित तथा वर्ज्य अवगुणों से भी रहित ब्राह्मण मध्यम श्रेणी के कहे गए हैं।श्राद्धमें कहीं भी स्त्री आदिको निमंत्रित करनेकी आज्ञा नहीं दी गई है। इससे सुस्पष्ट है कि श्राद्धमें ब्राह्मणी स्त्रियां भी वर्जित हैं।• यदि सभी भाई इकट्ठे रहते हों तो मिलकर ज्येष्ठ भाईके हाथसे श्राद्धादि करें।यदि अलग-अलग हों तो अलग-अलग ही श्राद्ध करें—*भ्रातॄणामविभक्तानां* *एक: धर्म प्रवर्तते।**विभागे सति धर्मोपि* *भवेत्तेषां पृथक् पृथक्।।* (#नारद०)• कूष्मांड/कुमहडा़/पेठा, भैंसका दूध, बेलपत्र और मगद्विज(पर्वतीय ब्राह्मण विशेष)इनके होने से पितर निराश होकर चले जाते हैं—*कुष्मांडं महिषीक्षीरं* *बिल्वपत्रमगद्विजा:।**श्राद्धकाले समुत्पन्ने* *पितरो यान्ति निराश्रया:।।* (#कृत्यसार)गयाजी तीर्थपुरोहित आचार्य प्रवीण पाठक पितृदोष निवारण .पिंडदान. तर्पण त्रिपिंडि श्राद्ध नारायण बली पूजा के लिए संपर्क करे 9661441389 //9905567875

Saturday, 5 September 2020

।।#श्राद्ध_में_सावधानी।। ।।२।।श्राद्ध पक्ष में एक बार तीर्थ पर अवश्य जाएं ।क्योंकि नरक में स्थित पितरों के लिए तीर्थ की जलांजलि बहुत ही दुर्लभ है। उससे तृप्त होकर पितर मुक्त हो जाते हैं--#पितृणां नरकस्थानां जलं तीर्थस्य दुर्लभं।तेन संतर्पिता: सर्वे स्वर्गं यान्ति मद्वच:।।प्रजा० स्मृतीर्थ पर ब्राह्मण की परीक्षा न करें।जो भी भोजनार्थी हो उसे भोजन करा दें--#तीर्थेषु ब्राह्मणं नैव परीक्षयेत् कथञ्चन्।अन्नार्थिमनुप्राप्तं भोजयेननुशासनात्।।प. पु०तीर्थ पर कुतुप काल की प्रतीक्षा न करें। वहां जाते ही श्राद्ध आदि करें-#तीर्थश्राद्धे कुतुपादि कालं न प्रतीक्षेत्। हारीत०पूजा/श्राद्धादि में नाभि से नीचे का भाग स्पर्श न करें--#कर्मयुक्तो नरो नाभेरध: स्पर्शं विवर्जयेत्। बोधा०अमावस्या श्राद्ध,गयाश्राद्ध,और तिलों से तर्पण में तीन काम जिसके पिता जीवित हों वे न करें। पिता को ही अधिकार है। पिता यदि असक्षम हैं तो उनकी आज्ञा से प्रतिनिधि के रूप में कर सकते हैं---#दर्शश्राद्धं गयाश्राद्धं तिलैर्तर्पणमेव च।न जीवितपितृको कुर्यात् कृत्वाधर्ममाप्नुयात।वह्नि पु०श्राद्ध में जिसका श्राद्ध है उसके निमित्त भोजन के लिए यदि भानजा मिले तो दस ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है ,दोहिता सौ ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है।जीजा हजार ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताया गया है। और जमाई सबसे श्रेष्ठ बताया गया है।अतः इनको भोजन,वस्त्र आदि देने में प्राथमिकता दें--#भागिनेयो दशविप्रेण दौहित्र शतमुच्यते।भगिनीभर्ता सहस्रैषु अनन्तं दुहितापति:।व्याघ्र० स्मृयदि भाई इकट्ठे रहते हों तो मिलकर ज्येष्ठ भाई के हाथ से श्राद्धादि करें।यदि अलग-अलग हों तो अलग-अलग ही श्राद्ध करें--#भ्रातृणामविभक्तानां एक: धर्म प्रवर्तते।विभागे सति धर्मोपि भवेत्तेषां पृथक् पृथक्।नारद०भोजन,हवन,दान, उपहार तथा वस्तु लेना , आचमन करना ,इनमें हाथ घुटनों के बाहर न करके कार्य करें--#भोजनं हवनं दानं उपहार: परिग्रह:।बहिर्जानु न कार्याणि तद्वदाचमनं स्मृतम्।बोधा०पेठा, भैंस का दूध, बेलपत्र और मगद्विज(पर्वतीय ब्राह्मण विशेष)इनके होने से पितर निराश होकर चले जाते हैं--#कुष्मांडं महिषीक्षीरं बिल्वपत्रमगद्विजा:।श्राद्धकाले समुत्पन्ने पितरो यान्ति निराश्रया:।कृत्यसारभोजन के दौरान नमक,घी, भोजन सामग्री बर्तन में ही दें, हाथ से नहीं--#हस्तदत्तं तु यत्स्नेहं लवणं व्यंजनादिकम्।दातुश्च नोपतिष्ठेत् भोक्ता भुंजीत किल्विषम्।दाल०सफेद तिलों का प्रयोग श्राद्ध में न करें-#अकृष्णतिलैर्मोहात्तर्पयेत्--प० पु० #आपत्ति काल में,ग्रहणादि में ,सूतक पातक में ब्राह्मणादि को कच्चे अन्न से श्राद्ध करना चाहिए अर्थात् कच्ची अन्न सामग्री दान करें।शूद्र सर्वदा कच्चा अन्न आदि से ही श्राद्ध करे--#आपद्यनाग्नौ तीर्थे च चंद्रसूर्यग्रहे तथा।आमश्राद्धं द्विजै: कार्यं शूद्रेण तु सदैव हि।। श्राद्ध वि०सधवा स्त्रियां काले तिल/कुशा का स्पर्श न करें --#न स्पृशेत्तिलं दर्भाश्च सधवा तु कदाचन्।कृत्य०ब्राह्मण पितृ तर्पण के बाद तथा क्षत्रियादि पितृ तर्पण से पहले भीष्म तर्पण करें--#ब्राह्मण: पितृतर्पणानन्तरं क्षत्रियादय: प्रथममेव भीष्मतर्पणं कुर्युरिति सदाचार:।(इत्यादि बहुत से नियम मेरी अद्वितीय कृति #कर्मकांडमीमांसा ग्रंथ से उद्धृत हैं)गयाजी तीर्थपुरोहित आचार्य प्रवीण पाठक पितृदोष निवारण .पिंडदान. तर्पण त्रिपिंडि श्राद्ध नारायण बली पूजा के लिए संपर्क करे 9661441389 //9905567875

Thursday, 18 June 2020

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● ‏महाकाल स्तोत्रं ‎.......इस स्तोत्र को भगवान् महाकाल ने खुद भैरवी को बताया था. ‏इसकी महिमा का जितना वर्णन किया जाये कम है. ‏इसमें भगवान् महाकाल के विभिन्न नामों का वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की गयी है ‎. ‏शिव भक्तों के लिए यह स्तोत्र वरदान स्वरुप है ‎. ‏नित्य एक बार जप भी साधक के अन्दर शक्ति तत्त्व और वीर तत्त्व जाग्रत कर देता है ‎. ‏मन में प्रफुल्लता आ जाती है ‎. ‏भगवान् शिव की साधना में यदि इसका एक बार जप कर लिया जाये तो सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है ।ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पतेमहाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुतेमहाकाल महादेव महाकाल महा प्रभोमहाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुतेमहाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहनमहाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुतेभवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमःरुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमःउग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमःभीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमःईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमःसघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमःअधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमःस्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमःपरमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुतेपवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुतेसोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुतेयजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमःसर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुतेब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुतेरूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुतेस्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमःनमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमःहुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमःसचिदानंद रूपआय महाकालाय ते नमःप्रसीद में नमो नित्यं मेघ वर्ण नमोस्तुतेप्रसीद में महेशान दिग्वासाया नमो नमःॐ ह्रीं माया ‎– ‏स्वरूपाय सच्चिदानंद तेजसेस्वः सम्पूर्ण मन्त्राय सोऽहं हंसाय ते नमःफल श्रुतिइत्येवं देव देवस्य मह्कालासय भैरवीकीर्तितम पूजनं सम्यक सधाकानाम सुखावहमजय महाकाल..।‼🙆🏼‍♂* ‏🔔‼‼‼‼‼🔔

*शिवजी पर तुलसी चढाने का फल**तुलसीमंजरीभिर्यः कुर्याद्धरिहराऽर्चनम् ।।* *न स गर्भगृहं याति मुक्तिभागी न संशयः ।। १३ ।।*(स्कंदे महापुराणे द्वितीये वैष्णवखण्डे त्रयोविंशोऽध्यायः)पद्मपुराण खण्डः ६ (उत्तरखण्डःअध्यायः १०५ -१३,)लिंगमभ्यर्चितं दृष्ट्वा, प्रतिमां केशवस्य च।तुलसीपत्रनिकरैर्मुच्यते ब्रह्महत्यया।।(ब्रह्मपुराण,नित्यकर्म पूजा प्रकाश, पृष्ठ 368)लिंगमभ्यर्चितं दृष्ट्वा सहोमासे च मामकम्।तुलसीपत्रनिकरैर्मुच्यते ब्रह्महत्यया !। (स्कन्दपुराण खण्डः २, वैष्णवखण्ड श्लोक ७)*_देवी तत्व पर तुलसी अर्पण विचार_* विना तुलस्या स्नानाङ्ग श्राद्ध यज्ञार्चनं प्रिये।न संपूर्ण फलं प्राहु: सर्व एव विपश्चित:!!सुंदरीभैरवीकाली ब्रह्माविष्णुविवस्वताम्।विना तुलस्या या पूजा सा पूजा निष्फला भवेत् ।सावित्री च भवानी च, दुर्गा देवीं सरस्वतीम्।योऽर्चयेत्तुलसीपत्रै: सर्वकामै: स मेधते।। (वृहत्तन्त्रसार)

Sunday, 23 September 2018

★ पितृ पक्ष - गया श्राद्ध-मे विशेष. 2018* •• जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती उनके लिये भी श्राद्ध-पक्ष में कुछ विशेष तिथियाँ निर्धारित की गई हैं । उन तिथियों पर वे लोग पितरों के निमित श्राद्ध कर सकते है । 1. प्रतिपदा : इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है । इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है । यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं । 2. पंचमी : जिन लोगों की मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिये । 3. नवमी : सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है । यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है । इसलिए इसे मातृ-नवमी भी कहते हैं । मान्यता है कि - इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है । 4. एकादशी और द्वादशी : एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं । अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो । 5. चतुर्दशी : इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है । जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है । 6. सर्वपितृमोक्ष अमावस्या : किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गये हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है । तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है । •• शास्त्र अनुसार - इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है । यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिये । 7. बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिये - यही उचित भी है । •• पिंडदान करने के लिए सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें । जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं । •• विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिये । यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है -- •• देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।। - वायु पुराण । •• श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है । •• ‘सिद्धांत शिरोमणि’ ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितर लोक है जहां पितर रहते हैं । •• पितर लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता । जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं । •• यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संघात से बना है । स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है । •• हिंदू मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता । मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास घूमता रहता है। •• श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है । इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है । •• ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। •• वास्तव में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है । •• पितर लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत हुए को खाता है । •• सच्चे मन, विश्वास, श्रद्धा के साथ किए गए संकल्प की पूर्ति होने पर पितरों को आत्मिक शांति मिलती है। तभी वे हम पर आशीर्वाद रूपी अमृत की वर्षा करते हैं । •• श्राद्ध की संपूर्ण प्रक्रिया दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके की जाये तो अच्छा - क्योंकि पितर-लोक को दक्षिण दिशा में बताया गया है । •• इस अवसर पर तुलसी दल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए । गया, पुष्कर, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में श्राद्ध करने का विशेष महत्व है । •• जिस दिन श्राद्ध करें उस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें । श्राद्ध के दिन क्रोध, चिड़चिड़ापन और कलह से दूर रहें। •• पितरों को भोजन सामग्री देने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग किया जाये तो अच्छा है । केले के पत्ते या लकड़ी के बर्तन का भी प्रयोग किया जा सकता है । 🙏🙏🏿